Tuesday, July 27, 2021

Janmasatmi : जानिए वे दशाएं जिनके चलते तय होता है जन्माष्टमी व्रत

<p style="text-align: justify;"><strong>Janmasatmi :</strong> पंचांग और पौराणिक आधार पर की गई गणना के मुताबिक अष्टमी पहले ही दिन आधी रात मौजूद हो तो जन्माष्टमी का व्रत पहले दिन होना चाहिए. मगर यह दूसरे दिन आधी रात से हो तो जन्माष्टमी का व्रत दूसरे दिन होता है.</p> <p style="text-align: justify;">- अष्टमी दोनों दिन आधी रात को अगर होती है और आधी रात में रोहिणी नक्षत्र का योग एक ही दिन हो तो जन्माष्टमी व्रत रोहिणी नक्षत्र वाले दिन में होती है.</p> <p style="text-align: justify;">- अष्टमी दोनों दिन आधी रात को मौजूद होने के साथ दोनों ही दिन अर्धरात्रि में रोहिणी नक्षत्र रहे तो जन्माष्टमी का व्रत दूसरे दिन होगा.</p> <p style="text-align: justify;">- अष्टमी अगर दोनों दिन आधी रात हो और अर्धरात्रि में दोनों दिन रोहिणी नक्षत्र योग न हो तो भी जन्माष्टमी का व्रत दूसरे दिन होना चाहिए.</p> <p style="text-align: justify;">-&nbsp; इसी तरह दोनों दिन अष्टमी आधी रात को मौजूद न हो तो हर में जन्माष्टमी व्रत दूसरे ही दिन होना चाहिए.</p> <p style="text-align: justify;">-&nbsp; इस दिन भक्त रात बारह बजे तक व्रत रखते हैं. मध्यरात्रि पर शंख और घंटों की आवाज से श्रीकृष्ण के जन्म की खबर चारों दिशाओं में गूंज उठती है. कृष्णजी की आरती उतार कर प्रसाद बांटा जाता है.</p> <p style="text-align: justify;"><br />यह मुहूर्त स्मार्त मत के अनुसार माना गया है. वैष्णवों के मतानुसार जन्माष्टमी अगले दिन मनाई जाएगी. हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार वैष्णव वे लोग हैं, जिन्होंने वैष्णव संप्रदाय में बतलाए नियमों के अनुसार विधिवत दीक्षा ली है. ये अधिकतर गले में कण्ठी माला पहनते हैं और माथे पर विष्णुचरण का चिन्ह (टीका) लगाते हैं. इनके अलावा सभी को धर्मशास्त्र में स्मार्त कहा गया है. यानी वह सभी, जिन्होंने विधिपूर्वक वैष्णव संप्रदाय से दीक्षा नहीं ली है, स्मार्त कहलाते हैं.</p> <p style="text-align: justify;">कैसे करें जन्माष्टमी व्रत-पूजन&nbsp;</p> <p style="text-align: justify;">1. &nbsp;व्रत में अष्टमी के व्रत से पूजन, नवमी के पारण से व्रत पूरा होता है.<br />2. &nbsp;व्रत से एक दिन पूर्व हल्का-सात्विक भोजन करें, स्त्री संग से वंचित रहें.<br />3. &nbsp;व्रत के दिन स्नानादि से निवृत होकर देवताओं को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर में बैठें.<br />4. &nbsp;हाथ में जल, फल और पुष्प लेकर संकल्प करके मध्यान्ह के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकी जी के लिए प्रसूति गृह बनाएं. अब इस सूतिका गृह में बिछौना बिछाकर उस पर शुभ कलश रखें.<br />5. &nbsp;भगवान श्रीकृष्ण जी को स्तनपान कराती देवकी जी की मूर्ति या चित्र रखें. पूजा में देवकी, वासुदेव, बलदेव, नन्द, यशोदा और लक्ष्मीजी इन नाम लेते हुए विधिवत पूजन करें।<br />6. &nbsp;यह व्रत रात बारह बजे के बाद ही खोला जाता है। इसमें अनाज का उपयोग नहीं होता. फलहार के रूप में कुट्टू आटे की पकौड़ी, मावे की बर्फ़ी, सिंघाड़े के आटे का हलवा बनता है.</p> <p style="text-align: justify;">इन्हें पढ़ें&nbsp;<br />Sankashti Chaturthi : गणपति के मूषकों ने रोक दी थी विष्णुजी की बारात</p> <p style="text-align: justify;">&nbsp;<br />Kamika Ekadashi : विष्णु पूजन के सबसे फलदायी व्रत की जानिए अनूठी कथा</p> lifestyle https://ift.tt/3BH7xel

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