Friday, July 2, 2021

Sawan 2021: सावन के महीने में है नाग पंचमी का पर्व, जानें डेट, मुहूर्त और महत्व

<p style="text-align: justify;"><strong>Nag panchami 2021 Date:</strong> नाग पंचमी के पर्व को विशेष माना गया है. इस दिन नाग देवता की पूजा का विधान है. नाग भगवान शिव के गले की शोभा बढ़ाते हैं. सावन का संपूर्ण महीना भगवान शिव की पूजा के लिए समर्पित है. इस माह में पड़ने वाले सोमवार को भगवान शिव की पूजा के लिए अत्यंत उत्तम माना गया है. आषाढ़ मास के बाद श्रावण यानि सावन का महीना आता है.</p> <p style="text-align: justify;"><strong>सावन का महीना कब है? (Sawan 2021 Date)</strong><br />पंचांग के अनुसार सावन का महीना 25 जुलाई 2021, रविवार से आरंभ होगा और 22 अगस्त को समाप्त होगा. सावन के महीन में पड़ने वाले सोमवार को भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना की जाती है.&nbsp;</p> <p style="text-align: justify;"><strong>नाग पंचमी कब है? ( Nag Panchami 2021)</strong><br />नाग पंचमी का पर्व सावन के मास का एक प्रमुख पर्व है. श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी का पर्व मनाया जाता है. इस दिन नाग देव के साथ भगवान शिव की पूजा और रूद्राभिषेक करना शुभ माना गया है. नाग देवता की पूजा करने से कालसर्प दोष दूर होता है.</p> <p style="text-align: justify;"><strong>नाग पंचमी का शुभ मुहूर्त (Nag Panchami Shubh Muhurat)</strong></p> <ul> <li style="text-align: justify;"><strong>नाग पंचमी पर्व:</strong> 13 अगस्त 2021</li> <li style="text-align: justify;"><strong>पंचमी तिथि प्रारम्भ:</strong> 12 अगस्त, 2021 को दोपहर 03 बजकर 24 मिनट से.</li> <li style="text-align: justify;"><strong>पंचमी तिथि समापन:</strong> 13 अगस्त, 2021 को दोपहर 01 बजकर 42 मिनट पर.</li> <li style="text-align: justify;"><strong>नाग पंचमी पूजा मुहूर्त: </strong>13 अगस्त 2021 को प्रात: 05 बजकर 49 मिनट से 08 बजकर 28 मिनट तक.</li> <li style="text-align: justify;"><strong>मुहूर्त की अवधि:</strong> 02 घण्टे 39 मिनट.</li> </ul> <p style="text-align: justify;"><strong>नाग पंचमी का महत्व (Nag Panchami Importance)</strong><br />हिंदू धर्म में नाग पंचमी के पर्व को विशेष माना गया है. इस दिन नाग देवता की विधि पूर्वक पूजा करने से सुख, समृद्धि में वृद्धि होती है. भय से मुक्ति मिलती है. ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का अहंकार तोड़ा था. नाग पंचमी पर नाग देवता को दूध से स्नान करने की परंपरा है. ऐसा करने से कालसर्प दोष का भी प्रभाव कम होता है.</p> <p style="text-align: justify;"><strong>यह भी पढ़ें:&nbsp;</strong><br /><strong><a title="Shani Chalisa: शनिवार को शनि चालीसा से करें शनि देव को खुश, इन 5 राशियों को होगा विशेष लाभ" href="https://ift.tt/3ycVwuo" target="">Shani Chalisa: शनिवार को शनि चालीसा से करें शनि देव को खुश, इन 5 राशियों को होगा विशेष लाभ</a></strong></p> <p style="text-align: justify;"><strong><a title="Guru Purnima 2021: जुलाई में इस दिन मनाया जाएगा 'गुरु पूर्णिमा' का पर्व, जानें शुभ मुहूर्त" href="https://ift.tt/3Ahkpa8" target="">Guru Purnima 2021: जुलाई में इस दिन मनाया जाएगा 'गुरु पूर्णिमा' का पर्व, जानें शुभ मुहूर्त</a></strong></p> lifestyle https://ift.tt/3xctf7d

Mahabharat : इन सात महिलाओं के आगे बड़े से बड़े योद्धा भी हार मान गए

<p style="text-align: justify;"><strong>Mahabharat :</strong> भारतवर्ष के इतिहास में मातृशक्ति का समय-समय पर अति महत्वपूर्ण योगदान रहा है खासतौर पर महाभारत और रामायण काल में उनकी भूमिकाएं अद्भुत रही हैं. इन दोनों ही काल में महिलाएं जितनी स्वतंत्र उतनी परतंत्र भी थीं, लेकिन कई मौकों पर उन्होंने अपनी जिद या ज्ञान-शौर्य के आगे बड़े-बड़े महारथियों को भी लोहे के चने चबा दिए. आइए जानते हैं कुछ ऐसी ही महिलाओं की कहानियां.</p> <p style="text-align: justify;"><strong>महारानी सत्यवती :</strong> राजा शांतनु की पहली पत्नी गंगा के जाने के बाद वह एक मछुआरे की बेटी सत्यवती से प्रेम विवाह कर बैठते हैं, लेकिन सत्यवती इसी शर्त पर उनसे विवाह करने के लिए राजी होती है कि गंगापुत्र देवव्रत नहीं, सत्यवती से जन्मी संतान ही हस्तिनापुर का राज सिंहासन संभालेगी. इसके चलते देवव्रत को ताउम्र ब्रह्मचर्य की भीष्म प्रतिज्ञा लेनी पड़ी. सत्यवती के ऋषि पाराशर से उत्पन्न बेटे वेद व्यास के जरिए ही कुरुवंश में धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर जन्मे. सत्यवती जिद न होती तो हस्तिनापुर के सिंहासन पर भीष्म आसीन होते और महाभारत का इतिहास ही कुछ और होता.</p> <p style="text-align: justify;"><strong>गांधार राजकुमारी गांधारी :</strong> सत्यवती के बाद राजकाज में किसी का दखल आया तो वह गांधार राजकुमारी और धृतराष्ट्र की पत्नीं गांधारी रहीं. कहा जाता है कि गांधारी का विवाह भीष्म ने जबरदस्ती धृतराष्ट से करवाकर पूरे परिवार को बंधक बना लिया था. गांधारी के लिए आंखों पर पट्टी बांधने का एक कारण यह भी था. धृतराष्ट्र के अंधेपन के चलते गांधारी और शकुनि को अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता संभालनी पड़ी. गांधारी को चिंता थी कि कहीं कुंती के बेटे राजपाट न ले लें, इसलिए उन्होंने शकुनि के जरिए दुर्योधन के भीतर पांडवों के प्रति घृणा भर दी. गांधारी ने ही अपनी शक्ति से दुर्योधन के अंग को वज्र बना दिया था, लेकिन श्रीकृष्ण के बहका देने से उसकी जंघा वैसी ही रह गई. गांधारी मानती थी कि श्रीकृष्ण के कारण युद्ध हुआ और उन्हीं के कारण उनके पुत्र मारे गए, तभी गांधारी ने श्रीकृष्ण को कुल नाश का श्राप दे दिया था.</p> <p style="text-align: justify;"><strong>कुंती :</strong> कुंती महाभारत का सबसे बड़ी महिला किरदार रहीं. वे एक शक्तिशाली महिला बनकर हस्तिनापुर में प्रवेश करती हैं, कुं&zwj;ती और माद्री दोनों पांडु की पत्नियां थीं. यदि पांडु को शाप नहीं लगता तो उनका कोई पुत्र होता, जो गद्दी पर बैठता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. पांडु के आग्रह पर कुंती-माद्री ने एक-एक कर देवताओं का आवाहन किया. तब कुंती को तीन और माद्री को दो पुत्र प्राप्त हुए. कुंती ने धर्मराज, वायु एवं इन्द्र देवता का आवाहन किया था तो माद्री ने अश्विन कुमारों का. इससे पहले कुंती ने विवाहपूर्व सूर्य से कर्ण को प्राप्त कर नदी में बहा दिया. पांडु के देहांत के बाद शोक में माद्री उनके साथ सती हो गईं. ऐसे में कुंति ने पांच पुत्रों के भविष्य के लिए हस्तिनापुर आईं. वहां पति पांडु के सभी हितैषियों से समर्थन जुटाया. कुंती के कहने पर धृतराष्ट्र और गांधारी को पांडवों को पांडु पुत्र मानना पड़ा.&nbsp;</p> <p style="text-align: justify;"><strong>द्रौपदी :</strong> सास कुंती के आदेश पर द्रौपदी के लिए पांचों पांडवों से विवाह करना कठिन निर्णय था, लेकिन परंपरा के विरुद्ध उसने किया. दुनिया के सामने नया उदाहरण रखते हुए सम्मान भी प्राप्त किया. द्रौपदी को महाभारत युद्ध का सबसे बड़ा कारण माना गया. द्रौपदी ने ही दुर्योधन को इंद्रप्रस्थ में कहा था, 'अंधे का पुत्र भी अंधा.' यही बात दुर्योधन को धंस गई. यही द्यूतकीड़ा में उसने शकुनि के साथ पांडवों को द्रौपदी को दांव पर लगाने के लिए राजी कर लिया था, जिसमें हार के बाद द्रौपदी का चीरहरण हुआ और उसकी दुशासन के खून से बाल धोने की शपथ ली थी.</p> <p style="text-align: justify;"><strong>सुभद्रा :</strong> कृष्ण की बहन सुभद्रा ने अर्जुन से शादी की थी. मगर बड़े भाई बलराम उनका विवाह कौरव कुल में कराना चाहते थे. मगर कृष्ण ने अर्जुन के हाथों सुभद्रा का हरण करवा दिया. द्वारिका में सुभद्रा के साथ अर्जुन का विवाह हुआ. इसके बाद एक वर्ष तक दोनों द्वारिका में रहे. शेष पुष्कर क्षेत्र में व्यतीत किया. 12 वर्ष पूरे होने पर अर्जुन सुभद्रा संग इन्द्रप्रस्थ लौटे. सुभद्रा को ही गर्भावस्था में अर्जुन ने चक्रव्यूह भेदन का तरीका सुनाया था, जिसे सुनते ही आधे में ही वह सो गईं और अभिमन्यु उससे बाहर निकलने का भेद नहीं जा सके.</p> <p style="text-align: justify;"><strong>लक्ष्मणा:</strong>&nbsp; श्रीकृष्ण की आठ पत्नियों में एक जाम्बवती थीं. जिनके पुत्र साम्ब का दिल दुर्योधन-भानुमती की पुत्री लक्ष्मणा पर आ गया था. दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगे थे. दुर्योधन के पुत्र का नाम लक्ष्मण था और पुत्री का नाम लक्ष्मणा था. मगर दुर्योधन पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण पुत्र से नहीं करना चाहता था. भानुमती सुदक्षिण की बहन और दुर्योधन की पत्नी थी, इसलिए एक दिन साम्ब ने लक्ष्मणा से प्रेम विवाह कर लिया और लक्ष्मणा को रथ में बिठाकर द्वारिका ले जाने लगा. कौरवों को पता लगने पर उन्होंने पूरी सेना लेकर साम्ब को बंदी बना लिया. यह बात श्रीकृष्ण-बलराम को पता चली तो बलराम हस्तिनापुर आ धमके. बलराम ने निवेदनपूर्वक कहा कि साम्ब को मुक्त कर उसे लक्ष्मणा संग विदा कर दें, लेकिन कौरवों ने नहीं मानी. तब बलराम ने रौद्र रूप प्रकट किया तो सभी माफी मांगने लगे. इस तरह साम्ब के साथ लक्ष्मणा की विदाई हुई.</p> <p style="text-align: justify;"><strong>सत्यभामा</strong> : सत्यभामा श्रीकृष्ण की पत्नी और राजा सत्राजित की पुत्री थीं. सत्यभामा को अपने सुंदर होने और श्रेष्ठ घराने की राजकुमारी होने का घमंड था और देवमाता यानी इंद्र की पत्नी अदिति से उन्हें चिरयौवन का वरदान मिला था. इसके चलते और अहंकारी हो गईं. वह राजकार्य और राजनीति में खास रुचि लेती थीं. नरकासुर वध के बाद जब श्रीकृष्ण स्वर्ग गए तो इन्द्र ने उन्हें पारिजात पुष्प दिया. इसे श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी को दे दिया तभी नारदजी आए और सत्यभामा को बताया कि पुष्प के प्रभाव से रुक्मिणी भी चिरयौवन हो गई हैं, यह सुनकर सत्यभामा क्रोधित हो गईं और श्रीकृष्ण से पारिजात वृक्ष की जिद्द करने लगीं. सत्यभामा का घमंड आखिरकार हनुमानजी को तोड़ना पड़ा.</p> <p style="text-align: justify;"><strong>इन्हें भी पढ़ें :&nbsp;</strong><br /><strong><a title="Mahabharat : अर्जुन को पाप से मुक्ति दिलाने के लिए उलूपी ने सौतेले बेटे से उनका वध कराया" href="https://ift.tt/3qD5liA" target="">Mahabharat : अर्जुन को पाप से मुक्ति दिलाने के लिए उलूपी ने सौतेले बेटे से उनका वध कराया</a></strong></p> <p style="text-align: justify;"><strong><a title="Ashadh Krishna Paksh: आषाढ़ मास का कृष्ण पक्ष शुरू, जानें इसका महत्व और पूजा विधि" href="https://ift.tt/3ytY33J" target="">Ashadh Krishna Paksh: आषाढ़ मास का कृष्ण पक्ष शुरू, जानें इसका महत्व और पूजा विधि</a></strong></p> <p style="text-align: justify;">&nbsp;</p> <p style="text-align: justify;">&nbsp;</p> lifestyle https://ift.tt/3yhzsPe

Shri Krishna Leela: रासलीला के लिए भगवान शंकर बने गोपी, मिला गोपेश्वर नाम

<p style="text-align: justify;"><strong>Shri Krishna Leela:</strong> रासलीला, जिसके बारे में सभी ने सिर्फ सुना है, कृष्ण के सिवा वहां किसी और पुरुष की उपस्थिति मान्य नहीं थी मगर इसका हिस्सा बनने के लिए भस्म से श्रृंगार करने वाले भोला भंडारी भी खुद को नहीं रोक सके. कृष्ण प्रेम में शंकर ने गोपी का भेष धारण कर लिया और सुध-बुध खोकर जमकर थिरके, मगर कृष्ण ने उन्हें पहचान लिया और शिव के गोपी स्वरूप को गोपेश्वर नाम दिया.<br /><br />कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव कैलाश पर्वत पर ध्यान में मग्र थे, उन्हें ध्यान में असीम आनंद महसूस हो रहा था. दूसरी ओर कृष्ण की बांसुरी की तान पर गोपियां रासलीला कर रही थी. शिवजी को आभास हुआ कि उन्हें आनन्द की अनुभूति उसकी बांसुरी की धुन से मिल रही है, जिस पर गोपियां थिरक रही हैं. <br /><br />शिव से रहा नहीं गया तो वे भी रासलीला का हिस्सा बनने के लिए वृन्दावन खिंचे चले गए. यहां जैसे ही शिव प्रवेश करने लगे तो नदियों की देवी वृन प्रकट हुईं, उन्होंने शिवजी को रोक दिया. वृन देवी ने शिवजी को बताया कि रासलीला में कृष्ण के अतिरिक्त कोई पुरुष शामिल नहीं हो सकता.</p> <p style="text-align: justify;">यकीनन शिव के लिए यह विचित्र स्थिति थी, क्योंकि शिव को पौरुष का प्रतीक माना जाता है. शिव दुविधा में पड़ गए, इधर गुजरते समय के साथ रासलीला चरम पर पहुंच रही थी. शिव समय बर्बाद नहीं करना चाहते थे और गोपी का भेष धारण करने को तैयार हो गए. घूंघट लेकर रासलीला का हिस्सा बनने के लिए चल दिए. वहां कृष्ण बांसुरी की तान पर वह इतने मस्त हो गए कि अपनी सुधबुध खो बैठे. नृत्य करते वक्त सिर से पल्लू हट गया. शिवजी को देखकर राधा और गोपियों डर गईं, लेकिन कृष्ण मुस्कुराने लगे.</p> <p style="text-align: justify;">कृष्ण ने शिव का राज सभी को बताया और शिव को रास का हिस्सा बनने के लिए धन्यवाद दिया. शिवजी ने कहा कि महारास का हिस्सा बन धन्य तो मैं हुआ, दिल करता है कि हमेशा के लिए यहीं रह जाऊं. इस पर कृष्ण ने शिव को गोपेश्वर नाम दिया, इसलिए आज भी शिव के गोपी स्वरूप की पूजा वृंदावन के गोपेश्वर या गोपीनाथ मंदिर में की जाती है.</p> <p style="text-align: justify;"><strong>इन्हें भी पढ़ें :&nbsp;</strong><br /><a title="Ashadh Krishna Paksh: आषाढ़ मास का कृष्ण पक्ष शुरू, जानें इसका महत्व और पूजा विधि" href="https://ift.tt/3ytY33J" target="">Ashadh Krishna Paksh: आषाढ़ मास का कृष्ण पक्ष शुरू, जानें इसका महत्व और पूजा विधि</a></p> <p style="text-align: justify;"><br /><a title="Mahabharat : अर्जुन को पाप से मुक्ति दिलाने के लिए उलूपी ने सौतेले बेटे से उनका वध कराया" href="https://ift.tt/3qD5liA" target="">Mahabharat : अर्जुन को पाप से मुक्ति दिलाने के लिए उलूपी ने सौतेले बेटे से उनका वध कराया</a></p> lifestyle https://ift.tt/3dAyeqG

Mahabharat : महाभारत में सर्वनाश के लिए जिम्मेदार बने ये अस्त्र-दिव्यास्त्र

<p style="text-align: justify;"><strong>Mahabharat</strong> : हथियार या संहारक अमूमन दो तरह के अस्त्र और शस्त्र हुए हैं. 'अस्त्र' ऐसे हथियार को कहा गया, जो किसी मंत्र या यंत्र से चलाए जाते थे. सह बहुत भयानक होते थे, इनसे चारों ओर हाहाकार मच जाता था। मौजूदा समय में यंत्र से फेंके जाने वाले अस्त्र जैसे तोप है तो मंत्र से जैसे ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र, पर्जन्यास्त्र आदि. जबकि दूसरे संहारक हाथों से चलाए जाने के कारण शस्त्र कहे गए. यह भी दो प्रकार के हुए यंत्र शस्त्र और हस्त शस्त्र. यंत्र शस्त्र मे शक्ति, तोमर, पाश, बाण सायक, शण, तीर, परिघ, भिन्दिपाल, नाराच आदि रहे तो हस्त शस्त्र में ऋष्टि, गदा, चक्र, वज्र, त्रिशूल, असि, खंजर, खप्पर, खड्ग, चन्द्रहास, फरसा, मुशल, परशु, कुण्टा, शंकु, पट्टिश, वशि, तलवार, बरछा, बरछी, कुल्हाड़ा, चाकू, भुशुण्डी आदि रहे.</p> <p style="text-align: justify;">चंद लोगों को ही था दिव्यास्त्र का ज्ञान<br />मंत्र से संचालित अस्त्र दिव्यास्त्र कहे जाते हैं. प्राचीनकाल में यह विद्या चंद लोगों को ही सिखाई जाती थी. ब्रह्मास्त्र चलाने के लिए कर्ण ने परशुराम से शिक्षा ली तो द्रोणाचार्य ने कौरवों समेत पांचों पांडवों को इसकी शिक्षा दी थी, लेकिन ब्रह्मास्त्र विद्या कर्ण, अर्जुन, भीष्म, द्रोणाचार्य और अश्वत्थामा के अलावा किसी को नहीं आई.&nbsp;</p> <p style="text-align: justify;">अस्त्र भी दो प्रकार के दिव्यास्त्र और यांत्रिकास्त्र हुए. दिव्यास्त्र मंत्रों से चलाए जाते थे. हर अस्त्र पर भिन्न-भिन्न देव या देवी का अधिकार होता है. मंत्र-तंत्र से ही इसे चलाया जा सकता है।&nbsp;<br />दिव्यास्त्रों में प्रमुख रूप से आग्नेयास्त्र, पर्जन्य, वायव्य, पन्नग, गरूड़, नारायणास्त्र, पाशुपत, ब्रह्मशिरा, एकागिन्न अमोघास्त्र और ब्रह्मास्त्र हैं.</p> <p style="text-align: justify;">दिव्यास्त्रों का असर : आग्नेयास्त्र अग्नि बरसता था तो पर्जन्य से भारी बारिश होने लगती थी. वायव्य से आंधी-तूफान बवंडर आ जाता था. इनका प्रभाव इतना घातक था कि पूरे युद्ध स्थल का वातावरण भयावह हो जाता था, इनसे बचना मुश्किल था, सिर्फ वही इनसे बच सकता था, जो इनकी काट जानता था.</p> <p style="text-align: justify;">ऐसे मिलते थे दिव्यास्त्र<br />इसके लिए कठिन तप, व्रत, उपवास, ध्यान आदि करके मन को काबू में करने पांचों इंद्रियों को संचालित करने की शक्ति पाई जाती थी. जो व्यक्ति एकचित्त हो जाता वही दिव्यास्त्र हासिल करने का अधिकारी बनता.</p> <p style="text-align: justify;">वासवी शक्ति: यह अमोघ अस्त्र भी कहा जाता है, जो सिर्फ इंद्र के पास था. इसकी खूबी ये थी कि यह अचूक होने के चलते एक बार ही प्रयोग हो सकता था. महाभारत में कर्ण को इसे इंद्र ने कवच कुंडल के बदले दिया था. कर्ण इसे प्रयोग अर्जुन को मार डालना चाहता था, लेकिन कर्ण को न चाहते हुए भी मित्र दुर्योधन के कहने पर महाशक्तिशाली घटोत्कच पर करना पड़ा.</p> <p style="text-align: justify;"><strong>इन्हें भी पढ़ें :&nbsp;</strong><br /><a title="Mahabharat : अर्जुन को पाप से मुक्ति दिलाने के लिए उलूपी ने सौतेले बेटे से उनका वध कराया" href="https://ift.tt/3qD5liA" target="">Mahabharat : अर्जुन को पाप से मुक्ति दिलाने के लिए उलूपी ने सौतेले बेटे से उनका वध कराया</a></p> <p style="text-align: justify;"><br /><a title="Ashadh Krishna Paksh: आषाढ़ मास का कृष्ण पक्ष शुरू, जानें इसका महत्व और पूजा विधि" href="https://ift.tt/3ytY33J" target="">Ashadh Krishna Paksh: आषाढ़ मास का कृष्ण पक्ष शुरू, जानें इसका महत्व और पूजा विधि</a></p> <p style="text-align: justify;">&nbsp;</p> lifestyle https://ift.tt/3hqmg3L

Shani Chalisa: शनिवार को शनि चालीसा से करें शनि देव को खुश, इन 5 राशियों को होगा विशेष लाभ

<p style="text-align: justify;"><strong>Shani Dev:</strong> शनि देव को कलियुग में एक प्रभावी ग्रह माना गया है. ज्योतिष शास्त्र में शनि देव को सभी नवग्रहों में अहम स्थान प्राप्त है. शिव भक्त शनि देव को सभी ग्रहों में दंडाधिकारी होने का दर्जा प्राप्त है. इसीलिए शनि की दृष्टि को कष्टकारी बताया गया है. ऐसा माना जाता है कि शनि की दृष्टि से मनुष्य ही देवता भी प्रभावित होते हैं. शनि के प्रकोप से पिशाच भी घबराते हैं. ज्योतिष शास्त्र में शनि को एक क्रूर ग्रह माना गया है.</p> <p style="text-align: justify;">शनि देव जब जन्म कुंडली में अशुभ स्थिति में होते हैं तो जीवन को कष्टों से भर देते हैं, व्यक्ति को परेशानी और बाधाओं से मुक्ति नहीं मिल पाती है. निरंतर जीवन में कोई न कोई दिक्कत बनी ही रहती है. इसीलिए शनि देव को शांत रखने की सलाह दी जाती है. शनि शांत रहते हैं तो जीवन में सुख और शांति बनी रहती है.&nbsp;</p> <p style="text-align: justify;"><strong>शनिवार के दिन शनि देव को करें प्रसन्न</strong><br />शनिवार का दिन शनि देव को समर्पित है. इस दिन विशेष पूजा करने से शनि देव बहुत जल्द प्रसन्न होते हैं. शनिवार के दिन शनि देव की विधि पूजा करनी चाहिए, इसके साथ ही शनि देव से जुड़ी चीजों का दान करने से भी शनि की अशुभता दूर होती है.</p> <p style="text-align: justify;"><strong>इन 5 राशियों को देना चाहिए विशेष ध्यान</strong><br />शनि देव को प्रसन्न रखने के लिए शनि चालीसा का पाठ अत्यंत उत्तम बताया गया है. शनि चालीसा का पाठ शनिवार के दिन करने से शनि देव बहुत जल्द अच्छे फल प्रदान करते हैं, और परेशानियों को दूर करते हैं. जिन लोगों पर शनि की दशा, ढैय्या और शनि की साढ़ेसाती चल रही है उन लोगों को शनिवार के दिन शनि चालीसा का पाठ अवश्य करना चाहिए. इस समय मिथुन राशि और तुला राशि पर शनि की ढैय्या और धनु, मकर और कुंभ राशि पर साढ़ेसाती चल रही है.&nbsp;</p> <p style="text-align: justify;"><strong>शनि वक्री 2021 (Shani Vakri 2021)</strong><br />वर्तमान समय में शनि का गोचर मकर राशि में है. शनि मकर राशि में ही वक्री हैं. यानि शनि उल्टी चाल चल रहे हैं.&nbsp;</p> <p style="text-align: justify;"><strong><a title="July 2021 Rashi Parivartan: मिथनु में बुध, कर्क में शुक्र और मंगल सिंह राशि में करेंगे राशि परिवर्तन, जानें डेट और टाइम" href="https://ift.tt/2SEQXtI" target="">July 2021 Rashi Parivartan: मिथनु में बुध, कर्क में शुक्र और मंगल सिंह राशि में करेंगे राशि परिवर्तन, जानें डेट और टाइम</a></strong></p> <p><strong>शनि चालीसा (Shani Chalisa in Hindi)</strong><br />जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥<br />चारि भुजा, तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छबि छाजै॥<br />परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥<br />कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिय माल मुक्तन मणि दमके॥<br />कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥<br />पिंगल, कृष्णो, छाया नन्दन। यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन॥<br />सौरी, मन्द, शनी, दश नामा। भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥<br />जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं। रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥<br />पर्वतहू तृण होई निहारत। तृणहू को पर्वत करि डारत॥<br />राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो। कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥<br />बनहूँ में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चुराई॥<br />लखनहिं शक्ति विकल करिडारा। मचिगा दल में हाहाकारा॥<br />रावण की गति-मति बौराई। रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥<br />दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डंका॥<br />नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा॥<br />हार नौलखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवायो तोरी॥<br />भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥<br />विनय राग दीपक महं कीन्हयों। तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥<br />हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी। आपहुं भरे डोम घर पानी॥<br />तैसे नल पर दशा सिरानी। भूंजी-मीन कूद गई पानी॥<br />श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई। पारवती को सती कराई॥<br />तनिक विलोकत ही करि रीसा। नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥<br />पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी। बची द्रौपदी होति उघारी॥<br />कौरव के भी गति मति मारयो। युद्ध महाभारत करि डारयो॥<br />रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला। लेकर कूदि परयो पाताला॥<br />शेष देव-लखि विनती लाई। रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥<br />वाहन प्रभु के सात सुजाना। जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥<br />जम्बुक सिंह आदि नख धारी। सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥<br />गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। हय ते सुख सम्पति उपजावैं॥<br />गर्दभ हानि करै बहु काजा। सिंह सिद्धकर राज समाजा॥<br />जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै। मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥<br />जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी॥<br />तैसहि चारि चरण यह नामा। स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥<br />लौह चरण पर जब प्रभु आवैं। धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥<br />समता ताम्र रजत शुभकारी। स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी॥<br />जो यह शनि चरित्र नित गावै। कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥<br />अद्भुत नाथ दिखावैं लीला। करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥<br />जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई। विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥<br />पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दै बहु सुख पावत॥<br />कहत राम सुन्दर प्रभु दासा। शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥</p> <p><strong>दोहा</strong><br />पाठ शनिश्चर देव को, की हों 'भक्त' तैयार।<br />करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥</p> <p><strong>यह भी पढ़ें</strong><br /><strong><a title="Monthly Horoscope July 2021: जुलाई में मेष, तुला और मकर राशि वाले सावधान रहें, सभी राशियों का जानें राशिफल" href="https://ift.tt/3qGabeU" target="">Monthly Horoscope July 2021: जुलाई में मेष, तुला और मकर राशि वाले सावधान रहें, सभी राशियों का जानें राशिफल</a></strong></p> lifestyle 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Coronavirus: मास्क पहनना सभी के लिए क्यों है जरूरी, क्या है विशेषज्ञों की राय, जानिए

<p style="text-align: justify;">दुनियाभर मे कोरोना वायरस के नए- नए वेरिएंट आने के बीच मास्क पहनना बचाव के सबसे महत्वपूर्ण उपायों में एक है. हालांकि, मास्क पहनने और वैक्सीन को लेकर विश्व स्वास्थ संगठन और अमरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के बीच मतभदे भी सामने आए हैं. विश्व स्वास्थ संगठन ने जहां सभी के लिए मास्क पहनना जरूरी बताया है, वहीं सीडीसी का मानना है कि वैक्सीन की दोनों डोज लेने वाले लोगों के लिए मास्क पहनना जरूरी नहीं है.</p> <p style="text-align: justify;">इस मुद्दे को लेकर विशेषज्ञों ने मिलीजुली राय व्यक्त की है. लेकिन मास्क पहनने की बात को लेकर सहमत हैं. विश्व प्रसिद्ध वायरल ट्रांसमिशन एक्सपर्ट प्रो. लिन्से मार का कहना है कि यह महामारी की स्थिति पर निर्भर करता है. आप जहां रह रहे हैं या फिर जहां जा रहे हैं, वहां संक्रमण की स्थति कैसी है, आप क्या काम करेंगे आदि मुद्दों के आधार पर तय होता है कि मास्क पहनना जरूरी है या नहीं. लेकिन प्रो. मार मानते हैं कि जिंदगी को किसी तरह से खतरे में डालने की बजाए मास्क पहनना बेहतर है.</p> <p style="text-align: justify;"><strong>मास्क से सभी का बचाव</strong><br />मास्क पहनने से उन लोगों का ज्यादा बचाव होता है जिन्होनें अभी वैक्सीन की डोज नहीं ली है. कई लोगों में संक्रमित होने के बाद भी लक्षण नहीं होते ऐसे में सभी के लिए मास्क पहनना बेहतर होता है. प्रो. मार का कहना है कि संक्रमण के मामले ज्यादा हैं और वैक्सीनेशन की रफ्तार कम है. डेल्टा वेरिएंट भी भी हावी हो रहा है, ऐसे में सभी को मास्क पहनना चाहिए.</p> <p style="text-align: justify;"><strong>भारत में फिलहाल मास्क पहनना जरूरी</strong><br />वहीं, भारत में फिलहाल मास्क पहनने की आवश्यकता है. बीएचयू के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. विजयनाथ के मुताबिक, महामारी की दूसरे लहर समाप्त नहीं हुई है और डेल्टा प्लस वेरिएंट के मामले भी सामने आए हैं. देश में टीकाकरण भी कम हुआ है. ऐसे में बचाव के लिए मास्क पहनना बहुत जरूरी है.</p> <p style="text-align: justify;"><strong>यह भी पढ़ें-&nbsp;</strong><br /><strong><a href="https://ift.tt/3qOevJq Control: शरीर में बनने लगेगा गुड कोलेस्ट्रॉल, इन 5 बातों का रखें ख्याल</a></strong></p> <p style="text-align: justify;"><strong><a href="https://ift.tt/3xcgSbp Tips: गर्मी और बारिश में बच्चों को होने वाले इंफेक्शन, घरेलू नुस्खों से करें ठीक</a></strong></p> lifestyle https://ift.tt/3qEQQLn

Mask Up India: कोरोना वायरस से बचाने में मास्क की क्या भूमिका है, जानिए

<p style="text-align: justify;">देश में कोरोना महामारी की दूसरी लहर का असर धीरे-धीरे कम हुआ है और संक्रमण के नए मामलों में गिरावट आ रही है. लेकिन महामारी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है और इससे बचाव जरूरी है. महामारी से बचने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है मास्क पहनना. कोरोना संक्रमण से बचाव में मास्क की बड़ी भूमिका है.</p> <p style="text-align: justify;">मास्क पहनने से व्यक्ति संक्रमित होने से बचता है. वहीं, संक्रमित हो चुके व्यक्ति से मास्क वायरस को दूसरे स्वस्थ लोगों में फैलने से रोकता है. वैज्ञानिकों के मुताबिक कोरोना वायरस के फैलने का मुख्य कारण ड्रॉपलेट्स हैं. ये ड्रॉपलेट्स संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या बोलने के दौरान मुहं से निकलती हैं. ऐसे में अगर संक्रमित व्यक्ति अपने मुंह को मास्क से अच्छे तरीके से ढक ले तो वायरस को फैलने से काफी हद तक रोका जा सकता है. &nbsp;&nbsp;</p> <p style="text-align: justify;"><strong>संक्रमण से ऐसे बचाता है मास्क</strong><br />वहीं, यदि स्वस्थ व्यक्ति मास्क पहनता है तो वह भी इन ड्रॉपलेट्स की चपेट में आने से बच सकता है. लोगों के मास्क पहनने से वायरस के प्रसार को रोकने में काफी हद तक मदद मिलती है. ऐसे में खुद को और दूसरे लोगों को बचाने के लिए मास्क पहनना जरूरी होता है. इसके लिए कपड़े का मास्क, सर्जिकल मास्क, एन 95 मास्क आदि का इस्तेमाल किया जा सकता है. &nbsp; &nbsp;&nbsp;</p> <p style="text-align: justify;"><strong>मास्क सही तरीके से पहनना भी महत्वपूर्ण</strong><br />मास्क का सही तरीके से पहनना भी जरूरी होता है. हाल ही में साइंटिफिक रिपो&zwnj;र्ट्स मैगजीन में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार मास्क को ठीक तरह से भी संक्रमण का खतरा रहता है. स्टडी से जुड़े सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रूपक बनर्जी के मुताबिक, फेस मास्क की फिटिंग बहुत मायने रखती है. सही फिटिंग नहीं होने से मास्क और चेहरे के बीच गैप रह सकता है और व्यक्ति &nbsp;वायरस की चपेट में आ सकता है. &nbsp;मास्क को इस्तेमाल करने के बाद नष्ट कर देना चाहिए. &nbsp;</p> <p style="text-align: justify;">&nbsp;<br /><strong>&nbsp;यह भी पढ़ें-&nbsp;</strong><br /><strong><a href="https://ift.tt/3jC7hGS Control: शरीर में बनने लगेगा गुड कोलेस्ट्रॉल, इन 5 बातों का रखें ख्याल</a></strong></p> <p style="text-align: justify;"><strong><a href="https://ift.tt/3xcgSbp Tips: गर्मी और बारिश में बच्चों को होने वाले इंफेक्शन, घरेलू नुस्खों से करें ठीक</a></strong></p> lifestyle https://ift.tt/3xg0Rks